*साधु संत चलते फिरते तीर्थ हैं बहते हुए पानी के समान हैं।*

*साधु अपने धर्मोपदेश में प्राणी मात्र को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं-आर्यिका सुरम्य मतीजी*
*केकड़ी 13 सितम्बर (पवन राठी )*
*साधु संत चलते फिरते तीर्थ हैं बहते हुए पानी के समान हैं। साधु अपने धर्मोपदेश में प्राणी मात्र को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। कोई भी नियम लेने पर उसके भंग करने पर पाप कर्म का उदय होता है। धन लक्ष्मी पुण्य की दासी है। इंसान के दुख आने पर ही अपने और पराये की पहचान कर सकता है। पाप कर्म का उदय आने पर व्यक्ति द्वारा अच्छे कार्य करने पर भी बुरा हो जाता है।* *सुख दुख में यदि मित्र का सहयोग रहने पर ही वह सच्चा मित्र है। पुण्यशाली जीव जंगल में भी मंगल कर देते हैं। जो व्यक्ति सत्कर्म कार्यों के प्रति आगे बढ़ता है उसे आत्मा और परमात्मा के प्रति जानकारी मिल जाती है जिससे वह भक्ति आराधना धर्मकार्यों के प्रति लगन रखने लगता है। क्रोध से हमेशा बचना चाहिए यह दूसरों के बजाय स्वयं के लिए हानिकारक होता है।*
*बारिश की बूंदें छोटी होती हैं लेकिन बरसात के लगातार बरसने पर नदियों का बहाव बन जाती हैं उसी प्रकार हमारे छोटे से प्रयास से जिंदगी में संयम व त्याग से जीवन में बदलाव ला सकते हैं। मानव जीवन व्यक्ति के संस्कार पूरे जीवन पर आधारित हैं। संस्कार सुख-दुख की अनुभूति के आधार स्वरूप होते हैं। अन्याय, भेदभाव, छल-कपट, मायाचारी से हड़प किया हुआ धन को बाह्य प्रदर्शन के द्वारा अपने सम्मान के लिए द्रव्य का दाप करना घोर विपत्ति का कारण बन सकता है। नेकी और* *ईमानदारी से कमाया हुआ धन फलदायी होता है। सुख मात्र धन में नहीं बल्कि भाईचारा, संतोष धन से ही चैन मिल पाता है।*
*आचार्य 108 सुन्दर सागर जी महाराज की सुशिष्या आर्यिका सुरम्य मति माताजी ने अपने चातुर्मासिक धर्म देशना के अंतर्गत धर्मोपदेश में कहे।*
*प्रातः जिनाभिषेक, शांतिधारा, जिनेन्द्र अर्चना सहित धार्मिक क्रियाएँ आर्यिका संघ के सानिध्य में सम्पन्न हुई।*
*मध्याह्न में आर्यिका माताजी द्वारा गोम्मटसार जीवकांड ग्रंथ का स्वाध्याय एवं जिज्ञासा समाधान हुआ।*
*मीडिया प्रभारी पारस जैन ने बताया कि आचार्य श्री के चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य राजेश कुमार, कमलेश कुमार, रमेशकुमार मनोहर पुरा परिवार ने प्राप्त किया।*
*दिलीप जैन के अनुसार आज सकल दिगंबर जैन समाज द्वारा चैबीसी युक्त त्रिलोक्य रोट तीज व्रत में रोट व खीर बनाकर पर्व मनाया गया। आर्यिका माताजी द्वारा रोट तीज व्रत कथा का प्रसंग सुनाया गया और कहा कि इस व्रत को नियम पूर्वक करने से धन-लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।* *शाम को आरती, भक्ति संगीत सहित आनंद यात्रा धर्म प्रभावना के साथ हुई एवं आर्यिका माताजी द्वारा धर्मावलंबियों को स्वाध्याय के माध्यम से आत्म ध्यान के प्रति ध्यान शिविर का कार्यक्रम हुआ।*
*धर्म सभा का संचालन बा. ब्र. कनक दीदी एवं पं. निकेत शास्त्री द्वारा किया गया l*









