*धन का सदुपयोग हमेशा दान, धर्म और पुण्य कार्य में लगाना चाहिए -आर्यिका सुरम्य मतीजी*

*धन और पद के अहंकार में किया गया कार्य विनाश का का कारण बन सकता है l*
*केकड़ी 12 सितम्बर (पवन राठी )*
*इंसान पुरुषार्थ करने में कमी नहीं रखता है लेकिन भाग्योदय न होने से सफलता को प्राप्त नहीं कर पाता है। अपने मान-सम्मान प्रतिष्ठा के लिए बाह्य प्रदर्शन में तो धन-द्रव्य लगा देते हैं लेकिन असहाय, दीन, निराश्रित के प्रति धन खर्च करने में हिचकिचाहट आती है। धन-सम्पदा के अहंकार में अपने-पराये के प्रति भी दूरी बनाने लग जाता है। धन और पद के अहंकार में किया गया कार्य विनाश का कारण बन सकता है। धन का सदुपयोग हमेशा दान, धर्म और पुण्य कार्य में लगाना चाहिए क्योंकि धन को कोई भी अपने साथ नहीं ले जा सकता है। धर्म के प्रति आस्था की समर्पणता से अपना जीवन को धर्ममय बना सकते हैं। अपने चंचल मन में स्थिरता आने पर ही आत्म-बोध को प्राप्त कर सकते हैं। पूजा, अभिषेक आदि कार्य करना ही मात्र धर्म नहीं है अपितु संयम-त्याग करने पर ही वास्तविकता को पा सकते हैं। मुनि निंदा से बचना चाहिए यह घोर पाप का कारण है। हमेशा दूसरों के प्रति कमी देख लेते हैं लेकिन स्वयं को पहचान नहीं पाते हैं। अन्न का कण और साधु का क्षण कभी बर्बाद नहीं करना चाहिए। एक छोटा सा अवगुण हजारों गुणों पर हावी हो सकता है, अतः अवगुणों से हमेशा दूर रहें। आचार्य सुन्दर सागर महाराज की सुशिष्या आर्यिका सुरम्यमति माता जी ने अपने चातुर्मासिक धर्म देशना के अन्तर्गत आयोजित धर्मसभा में अपने धर्मोपदेश में कहे।*
*प्रातः जिनाभिषेक, शांतिधारा, जिनेन्द्र अर्चना सहित समस्त धार्मिक क्रियाएं आर्यिका ससंघ के सानिध्य में सम्पन्न हुई।*
*मध्यान्ह में आर्यिका माताजी द्वारा गोम्मटसार जीवकांड ग्रन्थ का दैनिक स्वाध्याय एवं जिज्ञासा समाधान हुआ।*
*मीडिया प्रभारी पारस जैन ने बताया कि आचार्य श्री के चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पाद-प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य कांतादेवी, अशोक कुमार, ज्ञानचंद, अवनीश, संजयकुमार, हिमांशु सिंहल परिवार बघेरा वालों ने प्राप्त किया।*
*दिलीप जैन के अनुसार शाम को आरती, भक्ति संगीत, स्वाध्याय, प्रश्नोत्तरी, आनन्द यात्रा सहित धार्मिक कार्यक्रम आर्यिका ससंघ के सानिध्य में हुए।*
*13 सितम्बर रविवार को जैन धर्मावलम्बियों द्वारा त्रैलोक्य रोट तीज पर्व मनाया जायेगा।*
*धर्म सभा का संचालन बा. ब्र. कनक दीदी एवं निकेत शास्त्री द्वारा किया गया।*









